प्रकाशितवाक्य की पुस्तक के दो गवाह कौन है ?

दो गवाह

प्रकाशितवाक्य की पुस्तक के अध्ययन में कभी भी एक विचार नहीं हो सकते कि मैं जो कह रहा हूं वही सही है क्योंकि अगर वह ऐसा कह रहा है कि मैं जो कह रहा हूं वही सही है इसका मतलब वह दावा कर रहा है कि प्रकाशितवाक्य के दर्शनों का अर्थ इन 2000 सालों में यूहन्ना को नहीं बताया गया था लेकिन उसको बता दिया गया है तो उसकी इस बात पर हम कैसे विश्वास कर सकते हैं क्योंकि परमेश्वर का वचन जितना देना था उतना हमें दे दिया गया है और परमेश्वर की पवित्र आत्मा भी हमें दे दी गई है और जो इससे अलग नई शिक्षा बनाते हैं वह कल्ट cult कहलाते हैं।

जब प्रकाशितवाक्य की पुस्तक को अध्ययन करने की बात आती है तो यह बात जानना चाहिए कि हम से पहले ही इन 2000 सालों में बहुत से थियोलोजियन और डिनॉमिनेशन के लोगों ने इस पुस्तक के सभी बातों का अध्ययन किया है और अपने अपने दृष्टिकोण तैयार किए हैं तो हमारी जिम्मेदारी यह है कि हम हर दृष्टिकोण को अच्छे से देख लें और उस दृष्टिकोण में क्या कमजोर बिंदु है और क्या मजबूत बिंदु है उस पर ध्यान देना होगा और जो घटना है वह किस दृष्टिकोण के हिसाब से करीब करीब हो सकती है इसलिए किसी भी किताब को पढ़कर यह मान लेना कि यही प्रकाशितवाक्य का सही अनुवाद है तो वह बिल्कुल भी सही नहीं हो सकता।

जरुब्बाबेल और यहोशू 
(1) इसका कमजोर तर्क यह है क्योंकि जरुब्बाबेल और यहोशू वाली भविष्यवाणी पूरी हो चुकी है इसलिए इसका संदर्भ प्रकाशितवाक्य में नहीं आ सकता।
(2) जरुब्बाबेल और यहोशू इतने बड़े भविष्यवक्ता भी नहीं थे कि हम उनके आने की उम्मीद करें।
(3) इसके अलावा और जितने भी दृष्टिकोण हैं उन में उन लोगों को शामिल किया गया है जो बड़े भविष्यवक्ता हैं जिन्होंने वाकई में भविष्यवक्ताओं वाले काम किए हैं और हम जानते हैं कि ये कोई भविष्यवक्ता नहीं थे इसलिए हम उनकी सेवकाई के गुण को भी देखें कि किस गुण में इन्होंने सेवा की और उस सेवकाई को भी देखें जो वह करने वाले हैं।

[1]. पहला दृष्टिकोण है मूसा और एलिय्याह।

इसके आधार पर लोगों का जो तर्क बनता है वह मूसा और एलिय्याह का बनता है।

इस दृष्टिकोण को मानने के लिए उनके पास जो तर्क हैं वह यहूदियों का ही है क्योंकि यहूदी यह मानते हैं कि मूसा के समान परमेश्वर एक और भविष्यवक्ता भेजने वाला था, वे यह भी नहीं मानते हैं कि यह भविष्यवाणी प्रभु यीशु के बारे में थी इसलिए वे यह समझते हैं कि एक मूसा होगा और दूसरा एलिय्याह होगा क्योंकि उनकी मृत्यु नहीं हुई थी वे जिंदा आसमान में उठा लिए गए थे और उसके बारे में एक और भविष्यवाणी है कि प्रभु यीशु के आने से पहले वह आएगा करके, और इसलिए यहूदी यह नहीं मानते कि प्रभु यीशु मसीह की वह मसीहा है इसलिए वे यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले को भी जंगल में आवाज देने वाली की आवाज नहीं मानते हैं तो उनके मुताबिक एलियाह का आना अभी बाकी है।
इस दृष्टिकोण को क्रिस्चियन थियोलोजियंस ने स्वीकार किया हुआ है इस आधार पर क्योंकि मूसा और एलिय्याह ही थे जो प्रभु यीशु मसीह के रूपांतरण के समय वहां मौजूद थे इसलिए लोग इस दृष्टिकोण को मानते हैं क्योंकि यह उन्हें बहुत करीब लगता है।

इस दृष्टिकोण की कमजोरी

हमें परमेश्वर के वचन में नहीं बताया गया है कि वह मूसा और एलिय्याह ही होंगे।

परमेश्वर कभी वचन में से कुछ भी नहीं छुपाते हैं क्योंकि जो बात उन्हें लगती है कि कलीसिया को यह जानना जरूरी है तो उसे वह बताते हैं हम इसका एक बेहतरीन उदाहरण देखते हैं जब परमेश्वर सदोम और गमोरा को नष्ट करने वाले थे तो परमेश्वर सोच रहे थे कि यह बात मैं अब्राहम पर जाहिर करूं या ना करूं फिर उन्होंने जाहिर किया परमेश्वर हमेशा अपनी बातें अपने लोगों पर जाहिर करते हैं अगर परमेश्वर को उन दो गवाहों के नाम बताने होते तो जरूर बताया होता क्योंकि जब यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले के बारे में भविष्यवाणी की गई थी उसमें एलिय्याह के आने बारे में स्पष्ट रूप से बताया गया था कि उसका आना जरूरी है और उसका नाम भी बताया गया था तो अब परमेश्वर की ऐसी कौन सी मजबूरी हो गई कि उन्होंने नाम नहीं बताया तो इसका जवाब है कि उनकी कोई मजबूरी नहीं है क्योंकि परमेश्वर ने ऐसा कुछ नहीं सोचा है कि वह मूसा और एलिय्याह ही होंगे बल्कि यह इंसानों ने अपने आप सोचा है क्योंकि यहूदियों की ऐसी ही सोच है।

[2]. दूसरा दृष्टिकोण है हनोक और एलिय्याह।
मूसा और एलिय्याह के दृष्टिकोण को मानने वाले लोगों का यह मजबूत तर्क है कि हनोक और एलिय्याह दोनों की मृत्यु नहीं हुई है वह दोनों जिंदा आसमान में उठा लिए गए थे और यही वह दो लोग हैं जो परमेश्वर के दो गवाह हैं जिन्हें जैतून के दो पेड़ कहा गया है और वह यह भी सोचते हैं कि क्योंकि इंसान का जन्म लेकर मरना जरूरी है इसलिए हनोक और एलिय्याह दुनिया में फिर से आएंगे और उनकी मौत होगी इसमें सबसे बड़ी कमजोरी यह नजर आती है की हनोक और एलिय्याह दोनों धर्मी थे इसलिए परमेश्वर ने अपनी खुशी में यह तय किया कि इन पर से मृत्यु का वह श्राप उन से हटा ले जो आदम के सभी संतानों पर है और वह जिंदा स्वर्ग पर पहुंच गए अब जिंदा स्वर्ग में पहुंचने पर वह फिर से पैदा नहीं हो सकते सिर्फ इस बात का तर्क देने के लिए कि उनका मरना जरूरी है लेकिन परमेश्वर ने जो श्राप उन पर से हटा लिया था वह फिर से उनको नहीं देंगे यह कहकर कि आप तो आदम के संतान हो तो आपको भी मरना पड़ेगा।

इसलिए यह तर्क बहुत कमजोर है कि हनोक और एलिय्याह की मृत्यु नहीं हुई इसलिए वह दो गवाह यही हैं।

(3) तीसरा दृष्टिकोण है एलिय्याह और यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला।

 इस को मानने वाले सबसे ज्यादा लोग हैं क्योंकि यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला एलिय्याह है जो एलिय्याह की आत्मा और सामर्थ्य में आने वाला था और इसी के बारे में भविष्यवाणी है कि एलिय्याह का आना जरूरी है प्रभु यीशु मसीह के आने से पहले तो वह प्रभु यीशु मसीह के पहले आगमन और दूसरे आगमन में भी है तो जब एलियाह कहा जाता है तो उसमें यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला भी आ जाता है क्योंकि यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला एलिय्याह ही था क्योंकि यह शाब्दिक रूप से कहा गया है इस भविष्यवाणी के मुताबिक वह एलिय्याह और यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला है यह उनका तर्क है जो सबसे ज्यादा मशहूर है बाकी दोनों के अलावा लेकिन इसकी भी सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि हमें कोई नाम नहीं बताया गया है

तो सब दृष्टिकोण में सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि जितने लोग अपनी दलीलें पेश करते हैं सबके पास अपने-अपने तर्क हैं और वह कहते हैं कि हमारी तर्क सही है इन तर्कों के आधार पर लेकिन सब से अंतिम में जो हमें देखना है वह परमेश्वर का वचन है कि ऐसी क्या बात है कि परमेश्वर ने यूहन्ना को जिसने यह दो गवाह वाली बात लिखी थी उसको नहीं बताया पर आज आपको क्यों बता रहा है और परमेश्वर ने आपको प्रकाशितवाक्य का पूरा अनुवाद दिया है कि सिर्फ इसी का अनुवाद दिया है ? क्या परमेश्वर कभी ऐसा करता है कि भविष्यवाणियों की सूची में से परमेश्वर केवल एक या दो ही बात बताए और बाकी ना बताए ? 

तो इन सब बातों का निचोड़ यही है कि हमारा विश्वास परमेश्वर का वचन होना चाहिए और हमारा आखरी फैसला भी परमेश्वर का वचन ही होना चाहिए क्योंकि परमेश्वर के वचन में जब कोई नाम नहीं बताया गया है तो ऐसे अंदाजे लगाने के कोई फायदे नहीं है वह सही नहीं बैठ सकता क्योंकि आप अगर अपने दृष्टिकोण को सही साबित करने की कोशिश करेंगे तो दूसरा भी अपने दृष्टिकोण को सही बताएगा क्योंकि उसके पास भी तर्क है तो इससे होगा क्या सिर्फ बहस ही होगा क्योंकि लोगों ने अपने से अपना दिमाग लगाकर उसे जानने की कोशिश की है जबकि परमेश्वर ने उसे जाहिर करना नहीं चाहा है इसलिए प्रकाशितवाक्य में जो लिखा हुआ है उसे वैसे ही मान लिया जाना चाहिए।

सामान्य सी बात है जो हम परमेश्वर के वचन में परमेश्वर के काम करने के तरीकों को देखते हैं कि कोई इंसान फिर से जन्म नहीं पाता है जैसा हिंदू धर्म में बताया जाता है कि सात जन्म होता है लेकिन ऐसा नहीं होता है क्योंकि जब एलिय्याह की बात की गई थी तो वह वही यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला नहीं था जो पैदा हुआ था और एलिय्याह का वह वजूद जो आसमान में जिंदा था वह नहीं रहा ऐसा नहीं है क्योंकि एलिय्याह प्रभु यीशु मसीह के रूपांतरण के समय उस पहाड़ पर मौजूद था और यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला मर चुका था तो दोनों अलग-अलग शख्सियत हैं और भविष्यवाणी में कहा गया था कि यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला एलिय्याह की आत्मा और सामर्थ्य में आएगा इस तरह वह एलिय्याह होगा इस तरह से हम समझ सकते हैं कि जो दो गवाह आएंगे वह परमेश्वर के आत्मा की ओर से आएंगे चाहे वह मूसा हो या एलिय्याह हो जिन्होंने काम किया क्योंकि उनके शरीर इंसानों के थे लेकिन काम करने वाली सामर्थ्य परमेश्वर की आत्मा थी तो आने वाले दो गवाह भी जो आएंगे उनके पीछे भी परमेश्वर की आत्मा काम करेगी तो वह आत्मा जिसने यहूदियों में काम किया जितने चमत्कार किए पुराने भविष्यवक्ता में वह सारी चीजें आने वाले 2 गवाहों में भी होंगी क्योंकि यह वह भविष्यवक्ता होंगे जो मरने के बाद फिर से जी कर उठेंगे क्योंकि इसके पहले कोई भी पुराने नियम का भविष्यवक्ता मर कर जी नहीं उठा। यह ऐसे आखरी गवाह होंगे जिनमें वह पूरी सामर्थ्य भी होंगी जो पहले किसी भी भविष्यवक्ता में नहीं थे तो इसीलिए ऐसे किसी का नाम ढूंढना और सोचना कि मेरे पास यह तर्क है और जो मैं जो कह रहा हूं वही सही है इसका कोई लॉजिक नहीं बनता है क्योंकि दूसरा भी कहेगा कि मेरे पास भी तर्क है और इस प्रकार कोई भी किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंचेगा इसलिए प्रकाशितवाक्य की पुस्तक का अध्ययन करना हो तो हमें सभी दृष्टिकोण को देख लेना चाहिए कि दुनिया में क्या-क्या दृष्टिकोण बने हुए हैं और खुद से देखेंगे कि कौन कितना नजदीक है परमेश्वर के वचन के और उसके बाद किसी फैसले पर आए।

इसलिए ना तो मैं कह सकता हूं कि मैं जो कह रहा हूं वही सही है क्योंकि अगर परमेश्वर के वचन में नाम नहीं लिखे हुए हैं तो मैं भी नाम नहीं ले सकता हूं और मैं समझता हूं कि दूसरे किसी को भी नाम लेने की जरूरत नहीं है क्योंकि परमेश्वर ने जब नाम नहीं बताया है तो कोई इंसान कहां से नाम ढूंढ कर ला सकते हैं सिर्फ अपनी सोच से, अपनी समझ से, अपने पास्टर के हिसाब से या जो भी पुस्तक उसने पढ़ा है उसके हिसाब से।

-- Dr. P. A. Raj