जल और आत्मा से जन्म का क्या अर्थ है? नया आत्मिक जन्म या पानी और आत्मा से जनम लेना क्या होता है
यीशु ने उसको उत्तर दिया, “मैं तुझ से सच-सच कहता हूँ, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।” नीकुदेमुस ने उससे कहा, “मनुष्य जब बूढ़ा हो गया, तो कैसे जन्म ले सकता है? क्या वह अपनी माता के गर्भ में दूसरी बार प्रवेश करके जन्म ले सकता है?” यीशु ने उत्तर दिया, “मैं तुझ से सच-सच कहता हूँ, जब तक कोई मनुष्य जल और आत्मा से न जन्मे तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता।”
यूहन्ना 3.3-4
नीकुदेमुस ने यीशु से यह स्पष्ट करने के लिए कहा कि नया जन्म लेने से उसका क्या मतलब है। उसका प्रश्न निहित है कि वह एक वृद्ध व्यक्ति था। उसे पूरा यकीन था कि यीशु पुनर्जन्म या दूसरे भौतिक जन्म की बात नहीं कर रहा था। नीकुदेमुस उत्सुक और यीशु की व्याख्या सुनने के लिए अधीर था।
इस विषय पर कई विद्वानों द्वारा कई दृष्टिकोण / धारणा प्रस्तावित हैं। इन में से एक है कि
"पानी" यहाँ एमनियोटिक द्रव को दर्शता है जिसमें एक भ्रूण अपनी माँ के गर्भ में विकसित होता है जिसके बिना प्राकृतिक जन्म असंभव है। इसका मतलब है कि "पानी" भौतिक या प्राकृतिक जन्म को संदर्भित करता है, जबकि "आत्मा" आध्यात्मिक या अलौकिक जन्म को संदर्भित करता है। इन समर्थकों का दावा है कि यीशु कह रहे थे कि परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने के लिए प्राकृतिक जन्म पर्याप्त नहीं है, अलौकिक जन्म का भी अनुभव होना चाहिए। हालाँकि, पवित्रशास्त्र में "जल" का यह प्रयोग अनोखा है। इस धारना में दो जनम की बात नजर आती है जबकी मसीह सिर्फ एक ही नए जन्म की बात कर रहे हैं जो भौतिक जन्म के बाद ही संभव है।
एक अन्य लोकप्रिय दृष्टिकोण यह है कि "जल" परमेश्वर के लिखित वचन को संदर्भित करता है, और "आत्मा" पवित्र आत्मा को संदर्भित करता है। "पानी" का यह आलंकारिक उपयोग नए नियम में मौजूद है (इफि. 5:26), लेकिन पुराने नियम में यह असामान्य है। यह मुमकिन नहीं है कि निकोडेमस ने पानी को परमेश्वर के वचन से जोड़ पाया होगा ये तो अब हम समझ सकते हैं क्योंकि हमारे पास नया नियम मौजुद है। तो येशु मसीह जल के बजय "वचन और आत्मा" कहते जो निकिडेमस के लिए समझने में भी आसानी होती.
कुछ विदवान "जल" को पानी के बपतिस्मा के संकेत के रूप में लेते हैं, और आत्मा को आत्मिक बपतिस्मा। इस मत के अनुसार, आध्यात्मिक जन्म तभी होता है जब कोई व्यक्ति पानी का बपतिस्मा लेता है, और परिणामस्वरूप पवित्र आत्मा द्वारा नवजीवन का अनुभव करता है। हालाँकि, पवित्रशास्त्र बहुत स्पष्ट है कि पानी का बपतिस्मा उद्धार की गवाही, ना की पवित्र आत्मा पाने के लिए अनिवर्य कार्य। (यूह 3:16, 36; Eph. 2:8-9; तीतुस 3:5). इसके अलावा, निकोडेमस के लिए इसका कोई महत्व नहीं होता । वह मसीही बपतिस्मे के बारे में कुछ नहीं जानता था और ना तो आगे के वचन में यीशु न नए जन्म को स्पष्ट करने के लिए फिर कभी पानी के बपतिस्मे का उल्लेख किया।
अन्य लोगों ने सुझाव दिया है कि "जल" का संदर्भ है यूहन्ना के पानी का बपतिस्मा से और "आत्मा" पश्चाताप का एक संकेत हो सकता है। इस अनुसार यीशु नीकुदेमुस से यूहन्ना के अधीन होने का आग्रह कर रहे थे और युहन्ना का बपतिस्मा लेने , या कम से कम पश्चाताप / मन फिराव करने के लिए कह रहे थे। युहन्ना येशु का मार्ग तैयार करने वाला था ना की येशु। युहन्ना चेलो की येशु के पास भेजता था ना कि येशु युहन्ना के पास। क्यूकि युहन्ना की सेवा वहीं तक थी।
क्योंकि जो शरीर से जन्मा है, वह शरीर है; और जो आत्मा से जन्मा है, वह आत्मा है।
यूहन्ना 3.6
पद 6 में, यीशु ने स्पष्ट किया कि जन्म दो प्रकार के होते हैं, एक भौतिक और एक आध्यात्मिक। "शरीर" मानव के पापमय स्वभाव को संदर्भित करता है (1:14) और आत्मा आत्मिक जन्म को। जब तक हम् पवित्र आत्मा नहीं पाटे तब तक हम पाप में आत्मिक रूप से मरे हुए हैं।
यीशु आत्मिक जन्म की बात कर रहे थे, भौतिक जन्म की नहीं। नीकुदेमुस को इस विचार पर अचंभा नहीं करना चाहिए था कि आत्मिकb जनम भी होता है, क्योंकि पुराने नियम ने इसके बारे में बात की थी (भज. 87:5-6; यहेज. 36:25-28)।
इससे पता चलता है कि राज्य में प्रवेश आध्यात्मिक मामला है, भौतिक, वंश या योग्यता का मामला नहीं है। यह एक ऐसा रहस्योद्घाटन था कि यीशु के दिनों में निकोडेमस सहित अधिकांश यहूदी नहीं जानते थे। 3:7 नीकुदेमुस को आत्मिक जीवन की आवश्यकता थी। उसे नए जन्म का अनुभव करने की आवश्यकता थी।
उसने सोचा कि उसकी विरासत (वंश, स्थिति, पेशा , वह सब जिसने उसे वह बनाया जो वह था) उसे प्रवेश करने लाने के लिए पर्याप्त था। उसे यह सीखना था की उसे आत्मिक शुद्धिकरण और नवीनीकरण की आवश्यकता थी - जो केवल परमेश्वर ही कर सकता था और जो पवित्र आत्मा के द्वारा होता है।
इसी तरह आज ज्यादातर लोग अपने आप पर अपनी खुद की धार्मिकता पर भरोसा कर रहे हैं. आज ज्यादा लोग धोके में है कि वे पवित्र आत्मा पा चुके जब की मन फिरव भी नहीं किये होते।उन्हें भी यह जानने की जरूरत है कि उन्हें आत्मिक शुद्धकरण और नया जन्म की जरूरत है जो केवल परमेश्वर ही प्रदान कर सकता है। उन्हें नए सीरा से जन्म लेना चाहिए, अन्यथा कोई आशा नहीं है वे परमेश्वर के राज्य में प्रवेश कर रहे हैं।
एकमात्र दृष्टिकोण जो इन चारों मानदंडों के अनुरूप प्रतीत होता है वह है...
पुराना नियम अक्सर पानी का उपयोग हुआ करता था जो लाक्षणिक रूप से आत्मिक शुद्धिकरण और नवीनीकरण का प्रतीक हुआ कर्ता था (गिन. 19:17-19; यशा. 55:1-3; की तुलना करें। भ.सा 51:10; यरमियाह 2:13; 17:13; जकर्याह 14:8). परमेश्वर की आत्मा (या पवित्र आत्मा) पुराने में नियम में परमेश्वर के जीवन का प्रतिनिधित्व करता है (उत्पत्ति 1:2; 2:7; 6:3; अय्यूब 34:14)। परमेश्वर ने वादा किया कि था की वह पानी के रूप में लोगों पर अपनी "आत्मा" उंडेलेगा (यशा 32:15-16; योएल 2:28-29) और उस का परिणाम होगा, एक नया हृदय, एक नया मन अर्थत नया आत्मिक जनम। तो :
जल = शुद्धिकरण का प्रतीक
आत्मा = नविनीकरण का प्रतीक
शुद्धिकरण + नविनीकरण = नया आत्मिक मनुष्य या मसीही
(यिर्म. 31:31-34)।
तो येशु मसीह के कहने का कुछ यू मतलब निकलता है कि
मैं तुझ से सच-सच कहता हूँ, जब तक किसी मनुष्य का शुद्धिकरण और नवीनकरण ना हो ले तब तक वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता।
यदि कोई नये सिरे से न जन्मे तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।
अमीन

