पहला धन्य वचन मत्ती 5:3
धन्य हैं वे, जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है। मत्ती 5:3
"मन के दीन/गरीब" वे हैं जो मन और आत्मा के टूटे हुए हैं, जो अब खुद से कुछ भी उम्मीद नहीं करते हैं (यशा 57:15; यशा 66:2), "मन के दीन/गरीब" वे हैं जो अपनी स्वाभाविक अयोग्यता को पहचानते हैं, जो परमेश्वर की उपस्थिति में खड़े हों, और जो उसकी दया और अनुग्रह के लिए पूरी तरह से उस पर निर्भर हों (भजन 37:14; 40:17; 69:28-29, 32-33; नीतिवचन 16:19; 29:23; यशा. 61:1).
वे परमेश्वर की भलाई के लिए अपनी भलाई या संपत्ति पर भरोसा नहीं करते। यहूदी भौतिक समृद्धि को किसका संकेत मानते थे ? यहूदी भौतिक समृद्धि को ईश्वरीय आशीषें का संकेत मानते थे, क्योंकि बहुत सी आशीषों का वचन जो परमेश्वर ने पुराने नियमों में धर्मियों से किया था, वो ज़्यदातर भौतिक थे। इस धन्यता पर सबसे अच्छा दृष्टान्त है फरीसी और महसूल लेने वाला (लूका 18:10-14)।
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